मेवाड़ की धरती पर शौर्य, बलिदान और गौरव की कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं, और इनमें सबसे चमकता नाम है गुहिल वंश का। यह वंश न सिर्फ राजस्थान का, बल्कि विश्व का सबसे लंबे समय तक एक ही क्षेत्र पर शासन करने वाला राजवंश है। ‘हिन्दुआ सूरज’ के नाम से मशहूर इस वंश ने मेवाड़ को न केवल एक शक्तिशाली राज्य बनाया, बल्कि भारतीय संस्कृति और इतिहास में भी अमर छाप छोड़ी। गुहिल वंश की कहानी बाद में सिसोदिया वंश के रूप में और अधिक गौरवशाली हुई, जिसने मेवाड़ को नए शिखरों तक पहुँचाया। आइए, इस गौरवशाली वंश की कहानी को करीब से जानें—उसके उद्भव से लेकर रानी पद्मिनी के जौहर और राणा सांगा के युद्धों तक!
Table of Contents
गुहिल वंश का उद्भव और उत्पत्ति
गुहिल वंश का नाम इसके संस्थापक गुहिल या गुहादित्य के नाम पर पड़ा, जिन्होंने लगभग 566 ई. में इस वंश की नींव रखी। इस वंश की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं:
- कर्नल जेम्स टॉड (‘एनल्स एण्ड एंटिक्विटिज ऑफ राजस्थान’) और श्यामलदास (‘वीर विनोद’) के अनुसार, गुहिल वंश का उद्भव गुजरात के वल्लभी से हुआ। टॉड बताते हैं कि गुहिल वल्लभी के राजा शिलादित्य और रानी पुष्पावती का पुत्र था, जिसे नागर ब्राह्मणों ने पाला। एक गुफा (गुहा) में जन्म होने के कारण इसका नाम गुहिल पड़ा।
- डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा और मुहणोत नैणसी इसे सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते हैं।
- डी.आर. भण्डारकर ने आहड़ अभिलेख के आधार पर गुहिलों को ब्राह्मण माना।
- अबुल फजल ने इसे ईरान के बादशाह नौशेखाँ आदिल का वंशज बताया।
हालांकि उत्पत्ति पर मतभेद हैं, लेकिन यह निश्चित है कि गुहिल वंश ने मेवाड़ को अपनी कर्मभूमि बनाकर इतिहास रचा। मुहणोत नैणसी और टॉड के अनुसार, इस वंश की 24 शाखाएँ थीं, जिनमें मेवाड़ के गुहिल सबसे प्रसिद्ध हुए। आज भी यह वंश उदयपुर संभाग में मौजूद है।
गुहिल वंश की विशेषताएँ
- संस्थापक: गुहिल या गुहादित्य (566 ई.)।
- उपाधि: इस वंश के शासकों को ‘हिन्दुआ सूरज’ कहा जाता था, जो उनकी सूर्यवंशी परंपरा और नेतृत्व का प्रतीक है।
- कुलदेवता: एकलिंग जी (शिव), जिनका मंदिर उदयपुर के कैलाशपुरी में है। यह पाशुपत संप्रदाय का प्रमुख केंद्र है।
- कुलदेवी: बाणमाता; अन्नपूर्णा माता इष्टदेवी थीं।
- राजचिह्न: उगता सूरज और धनुष-बाण।
- प्रमुख उपलब्धि: विश्व में सबसे लंबे समय तक एक क्षेत्र (मेवाड़) पर शासन करने वाला वंश।
प्रमुख शासक और उनकी उपलब्धियाँ
गुहिल/गुहादित्य (566 ई.)
- वंश का संस्थापक, जिसने मेवाड़ में शासन की नींव रखी।
- आगरा से मिले उनके सिक्के उनकी प्रारंभिक शक्ति के साक्षी हैं।
- टॉड के अनुसार, गुहिल का जन्म एक गुफा में हुआ, जिसके कारण उनका नाम पड़ा।
बप्पा रावल (734-753 ई.)
- गुहिल वंश के वास्तविक संस्थापक माने जाते हैं, जिन्होंने मेवाड़ को एक शक्तिशाली राज्य बनाया।
- वास्तविक नाम: कालभोज, जिसने ‘बप्पा रावल’ की उपाधि धारण की। कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) में उन्हें ‘विप्र’ कहा गया।
- उपाधियाँ: ‘हिन्दुआ सूरज’, ‘राजगुरु चक्कवै’ (चारों दिशाओं का विजेता)।
- प्रमुख उपलब्धियाँ:
- 734 ई. में चित्तौड़ के शासक मानमोरी को हराकर मेवाड़ राज्य की स्थापना की। नागदा को राजधानी बनाया।
- मुस्लिम आक्रमणकारियों को हराते हुए गजनी तक पहुँचे। इतिहासकार सी. वी. वैद्य ने उन्हें फ्रांसीसी सेनापति चार्ल्स मार्टेल की संज्ञा दी।
- एकलिंग जी मंदिर की स्थापना उदयपुर के कैलाशपुरी में की, जहाँ वे स्वयं को दीवान और एकलिंग जी को शासक मानते थे।
- राजस्थान में पहली बार सोने के सिक्के (115 ग्रेन) जारी किए।
- हरित ऋषि के शिष्य थे (नैणसी और टॉड के अनुसार)।
- समाधि: नागदा में, जिसे ‘बप्पा रावल का मंदिर’ कहते हैं।
- प्रशस्तियाँ: एकलिंग प्रशस्ति और रणकपुर प्रशस्ति में उनकी दंतकथाएँ मिलती हैं।
अल्लट (951-953 ई.)
- ख्यातों में ‘आलू रावल’ के नाम से जाना जाता है।
- आहड़ को दूसरी राजधानी बनाया और वहाँ वराह मंदिर बनवाया।
- नौकरशाही का संस्थापक माना जाता है।
- राष्ट्रकूटों को हराकर हूण राजकुमारी हरिया देवी से विवाह किया।
शक्ति कुमार (977-993 ई.)
- मालवा के परमार शासक मुंज ने आहड़ पर आक्रमण कर उसे नष्ट किया, जिसके बाद शक्ति कुमार ने नागदा को पुनः राजधानी बनाया।
- परमार शासक भोज ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाया।
कर्ण सिंह/रण सिंह
- आहोर के पर्वत पर किला बनवाया।
- उनके दो पुत्रों—क्षेमकरण और राहप/माहप—ने क्रमशः रावल शाखा और राणा शाखा शुरू की।
- क्षेम सिंह के पुत्र कुमार सिंह और सामंत सिंह प्रथम थे।
रावल सामंत सिंह (1172-1191 ई.)
- अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज द्वितीय की बहन पृथ्वीबाई से विवाह किया।
- जालोर के कीर्तिपाल चौहान ने सामंत सिंह को हराकर मेवाड़ पर कब्जा किया।
- सामंत सिंह ने वागड़ क्षेत्र में 1178 ई. में गुहिल वंश की स्थापना की और तराईन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज चौहान की मदद की।
- उनके भाई मथन सिंह ने कीर्तिपाल को हराकर मेवाड़ पुनः हासिल किया।
जैत्र सिंह (1213-1250 ई.)
- मेवाड़ के स्वर्णकाल का शासक, जिसने मेवाड़ की खोई प्रतिष्ठा वापस लौटाई।
- चित्तौड़गढ़ को राजधानी बनाया और परमारों को हराया।
- भुताला के युद्ध (1227 ई.) में दिल्ली सल्तनत के शासक इल्तुतमिश को हराया, जिसका उल्लेख जयसिंह सूरी के ग्रंथ ‘हम्मीर मदमर्दन’ और ‘तारीख-ए-फरिश्ता’ में है।
- 1248 ई. में नसीरुद्दीन महमूद को परास्त किया।
- चीरवा अभिलेख के अनुसार, मालवा, गुजरात, मार्वाड़ और दिल्ली के शासक भी उसे परास्त नहीं कर सके।
- जी.एच. ओझा ने उन्हें ‘रण रसिक’ और डॉ. दशरथ शर्मा ने ‘मेवाड़ की नव शक्ति का संचारक’ कहा।
- उनके सेनापति बालक और मदन थे।
तेज सिंह (1250-1273 ई.)
- मेवाड़ चित्रशैली की शुरुआत उनके काल में हुई।
- 1260 ई. में कमलचन्द्र द्वारा ‘श्रावक प्रतिक्रमणसूत्रचूर्णी’, मेवाड़ का पहला चित्रित ग्रंथ, रचित हुआ।
- दिल्ली सल्तनत के बलबन का आक्रमण असफल रहा।
- रानी जयतल्लदेवी ने चित्तौड़ में श्यामा पार्श्वनाथ मंदिर बनवाया।
- उपाधियाँ: उमापतिवारलब्धप्रौढ़प्रताप, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर।
समर सिंह (1273-1302 ई.)
- विद्या और कला के लिए प्रसिद्ध काल।
- विद्वान जैसे रत्नप्रभसूरी, पार्श्वचन्द्र, भावशंकर, वेदशर्मा, शुभचन्द्र, और शिल्पी पद्म सिंह, केल सिंह, केल्हण उनके दरबार में थे।
- जीव हिंसा पर रोक लगाई।
- चीरवा अभिलेख: उन्हें ‘सिंह के समान’ कहा गया।
- कुंभलगढ़ प्रशस्ति: ‘शत्रुओं की शक्ति का अपहरणकर्ता’।
- उनके पुत्र कुंभकरण ने नेपाल में गुहिल वंश की स्थापना की।
रतन सिंह (1302-1303 ई.)
- मेवाड़ की रावल शाखा का अंतिम शासक और रावल उपाधि धारण करने वाला आखिरी शासक।
- पद्मिनी (सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती की पुत्री) से विवाह किया। पद्मिनी का प्रिय तोता हीरामन था।
- पद्मावत (1540 ई., मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा अवधी में मसनवी शैली में रचित) के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी ने पद्मिनी को पाने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण किया। तांत्रिक राघव चेतन ने अलाउद्दीन को पद्मिनी के सौंदर्य की जानकारी दी।
- 26 अगस्त 1303: अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर कब्जा किया। यह चित्तौड़ का पहला साका और राजस्थान का दूसरा साका था। रावल रतन सिंह ने केसरिया किया, और रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर किया।
- मेवाड़ के दो सरदार—गोरा (पद्मिनी का काका) और बादल (भाई)—वीरगति को प्राप्त हुए। हेमरतन सूरी ने ‘गोरा बादल पद्मिनी चौपाई’ रची।
- अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्र खाँ को चित्तौड़ का प्रशासक बनाया और इसका नाम खिज्राबाद रखा। खिज्र खाँ ने गंभीरी नदी पर पुल और एक मकबरा बनवाया, जिसमें 1305 ई. का फारसी शिलालेख है।
- अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन के साथ चित्तौड़ में रहते हुए 30,000 नागरिकों के कत्ले आम का उल्लेख किया।
- जालौर का मालदेव सोनगरा (‘मुंछाला मालदेव’) 1316-1326 ई. तक चित्तौड़ का प्रशासक रहा।
- खजाइन-उल-फुतुह पुस्तक में अलाउद्दीन के चित्तौड़ आक्रमण की जानकारी मिलती है।
सिसोदिया वंश: गुहिल वंश का नया अध्याय
रतन सिंह के बाद गुहिल वंश का नेतृत्व राणा शाखा ने संभाला, जिसे सिसोदिया वंश के नाम से जाना गया। यह शाखा सिसोदा गाँव से शुरू हुई और मेवा को एक नया गौरव प्रदान किया। राणा हम्मीर ने इस वंश की नींव रखी, और उनके बाद के शासकों ने मेवा को अजेय बनाया। आइए, सिसोदिया वंश के प्रमुख शासकों की कहानी जानते हैं।
राणा हम्मीर (1326-1364 ई.)
- सिसोदा गाँव का निवासी, जिसके पिता अरि सिंह और दादा लक्ष्मण सिंह थे।
- सिसोदिया शाखा का प्रथम शासक, जिसने राणा उपाधि धारण की। इसके बाद मेवा के सभी शासक राणा या महाराणा कहलाए।
- प्रमुख उपलब्धियाँ:
- 1326 में सोनगरा को हराकर चित्तौड़ पर कब्जा किया और गुहिल वंश कीना की।
- सिसोदा का जागीरदार होने के कारण उन्हें सिसोदिया कहा गया, और गुहिल वंश सिसोदिया वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
- सिंगोली के युद्ध (बांसवाड़ा) में दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक को पराजित किया।
- चित्तौड़ में अन्नपूर्णा माता (बरवड़ी माता) के मंदिर का निर्माण करवाया। बरवड़ी माता गुहिल वंश की इष्टदेवी और बाणमाता कुलदेवी हैं।
- उपाधियाँ:
- ‘मेवा का उद्धारक’: चित्तौड़ को पुनः प्राप्त करने के लिए।
- ‘वीर राजा’ (‘रसिक प्रिया’ पुस्तक में).
- ‘विषमघाटी पंचानन’ (कुंभलगढ़ प्रशस्ति में).
- महत्व: हम्मीर ने मेवा को विदेशी शासन से मुक्त कराकर सिसोदिया वंश की नींव रखी।
महाराणा खेता/क्षेत्र सिंह (1364-1382 ई.)
- हम्मीर का पुत्र।
- प्रमुख उपलब्धियाँ:
- मालवा के शासक दिलावर खाँ गौरी को हराया, जिससे ‘मेवा’ मालवा संघर्ष’** शुरू हुआ।
- अजमेर, जहाजपुर, माण्डल, और छप्पन के क्षेत्रों को मेवा में मिलाया।
- बूंदी के हाड़ा को हराकर बूंदी को अधीन किया।
- महत्व: क्षेत्र सिंह ने मेवा का विस्तार किया और मालवा के साथ प्रतिद्वंद्विता की शुरुआत की।
महाराणा लाखा/लक्ष सिंह (1382-1421 ई.)
- हम्मीर का पौता और खेता का पुत्र।
- प्रमुख उपलब्धियाँ:
- जावर में जस्ते और चाँदी की खानों की खोज हुई।
- पिछोला झील (उदयपुर) का निर्माण पिच्छू नामक चित्रकार बनाया गया। इसके पास नटनी का चबूतरा बना है।
- मारवाड़ के राव चूंडा की पुत्री हंसा बाई से विवाह किया, जिससे पुत्र मोकल हुआ।
- ज्येष्ट पुत्र चूंडा को ‘मेवा’ का भीष्म पितामह’** कहा जाता है, जिन्हें उनके त्याग के लिए विशेषाधिकार दिए गए।
- बूंदी के नकली किले की कहानी में उनके साले कुंभा हाड़ा ने बलिदान दिया।
- सेना में ‘हरावल’ (अग्रिम टुकड़ी) और ‘चंदावल’ (पिछली टुककी) की शुरुआत हुई।
- दरबार में संगीतकार झोटा भट्ट और धन्येश्वर भट्ट थे।
- महत्व: लाखा ने मेवा की आर्थिक समृद्धि और सामाजिक विकास को बढ़ाया।
महाराणा मोकल (1421-1433 ई.)
- लाखा और हंसा बाई का पुत्र; चूंडा इसका संरक्षक था।
- प्रमुख उपलब्धियाँ:
- प्रारंभिक शासन पर रणमल राठौर (मामा) का प्रभाव था। हंसा के विश्वास के कारण चूंडा मालवा चला गया, जहाँ सुल्तान होशंगशाह था।
- दरबार में विद्वान योगेश्वर, भट्ट विष्णु, और शिल्पी फना, वसील, मना थे।
- त्रिभुवन नारायण मंदिर (परमार भोज द्वारा निर्मित) का जीर्णोद्धार कराया, जिसे ‘मोकल का मंदिर’ या ‘समिद्धेश्वर मंदिर’ कहते हैं।
- एकलिंग जी मंदिर के परकोटे का निर्माण करवाया।
- रामपुरा का युद्ध (1428, भीलवाड़ा) में नागौर के फिरोज खां को हराया।
- जिलवाड़ा का युद्ध (1433) में गुजरात के अहमदशाह को हराया।
- मृत्यु: 1433 में जिलवाड़ा में मेवाड़ी सरदारों चाचा और मेरा ने उनकी हत्या कर दी।
- महत्व: मोकल ने मेवा की सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति को बढ़ाया।
महाराणा कुम्भा (1433-1468 ई.)
- मोकल और सौभाग्यवती परमार का पुत्र; 1433 में शासक बना। रणमल इसका संरक्षक था।
- उपाधियाँ (कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में उल्लिखित):
- अभिनव भरताचार्य: संगीत का ज्ञान।
- परम्भागवत, आदि वराह: विष्णु भक्त।
- हिंदू सुरताण: हिंदुओं का रक्षक।
- छाप गुरु: छापामार युद्ध में निपुण।
- हाल गुरु: पहाड़ी दुर्गों का स्वामी।
- राणो राय: साहित्य और कला के संरक्षक।
- नाटकराज कर्ता: नृत्य शास्त्र का ज्ञाता।
- चाप गुरु: शस्त्र विद्या में पारंगत।
- अन्य: रायणा राय, राजगुरु, दान गुरु, शैल गुरु, नरपति, अश्वपति, गजपति।
- प्रमुख निर्माण कार्य:
- दुर्ग: मेवा के 84 दुर्गनों में से 32 बनाए, जैसे कुंभलगढ़, बस्सी, भोमट, मचन, अचलगढ़।
- कुंभलगढ़: मेवा-मारवाड़ का सीमा प्रहरी, 36.1 किमी। प्राचीर के साथ। कटारगढ़ (कुंभ का निवास) को ‘मेवा की म’ कहते हैं।** शिल्पी: महेश। कुंभलगढ़ प्रश में कुम्भा को धर्म का अवतार कहा। टॉड ने इसे ‘एट्रस्कन डर्ग’ की संज दी। अबुल फजल ने कहा, “इसकी ऊँचाई देख सिर से पग गिर गिरती है।”
- मंदिर:
- कुंभस्वामी मंदिर (विष्व): चितटा, कुंभलगढ़, अचलगढ़।
- विष्व मंदिर, कुशल माता मंदिर (बदनोर).
- रणकपुर जैन मंदिर (1439, मथाई नदी): धरणकशह द्वारा निर्मित, चौमुखा मंदिर (1444 स्तम्भ), दैपक शिल्पी, भगवान वृभभदेव को समर्पित। इसे ‘स्तम्भों का अजायबघर’ कहते हैं।
- श्रंगार चवरी मंदिर (शान्तिनाथ जैन): चिताल के कोषाध्यक्ष वेलक भण्डारी द्वारा बनाया।
- विजय स्तम्भ (1448, चिततौड़): सारंगपुर युद्ध (1437, मेंमुद खिल्जी प्रथम पर विजय) की स्मृति में। 37.19 मीटर ऊँचा, 9 मंजिली। जैता और पुत्र (नापा, पूजा, पोमा) शिल्पी। पद्मिनी की छवि शीर्ष पर। नाम: कीर्ती स्तम्भ, विष्य ध्वज, गरूध ध्वज, मूर्तियों का अजायबघर, भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष। तीसी मंजिल पर अल्लाह (9 बार अरबी में) लिखा। 1852 में स्वरूप सिंह ने पुनर्निर्माण कराया। फर्ग्यूसन: ‘रोम का ट्रॉजन टावर’। टॉड: ‘कुतुबमिनार’। गॉटज: ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष’। 15 अगस्त 1949: भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया।
- जैन कीर्ति स्तम्भ: जीजा शाह बघेरवाल द्वारा 12वीं सदी में बनाया, ऋषभदेव को समर्पित, 7 मंजिली।
- दुर्ग: मेवा के 84 दुर्गनों में से 32 बनाए, जैसे कुंभलगढ़, बस्सी, भोमट, मचन, अचलगढ़।
- साहित्य और संगीत:
- रचनाएँ: संगीत सुधा, संगीत मीमांसा, सुधा प्रबन्ध, कामराज रतिसार, वाद्य प्रबंद, संगीत क्रम दीपिका, सूड प्रबन्ध, संगीत राज (5 भाग: पाठ्य, गीत, नृत्य, वाद्य, रस रत्नकोश), रसिक प्रिया (गीत गोविन्द पर टीका), संगीत रत्नाकर और चण्डीशतक पर टीकाएँ, एकलिंग महात् (कांम्हव्यास ने पूर्ण किया).
- विद्वान: मण्डन (देवमूर्ति प्रकरण, प्रासाद मण्डन, राजवल्लभ, रूपमण्डन), नाथा (वास्तुंजरी), गोविंद (उद्धार धोरणी, सार समुच्चय), मोहाजी (तीर्थमाला), सुंदर सूरी, जयचन्द्र सूरी, सोमदेव, सुंदरगणि।
- संगीतज्ञ: वीणा वादक, सारंग व्यास गुरु। पुत्री रमा बाई (‘वागीश्वरी’ उपाधि) संगीत में निपुण थी। हीरानन्द मुनि गुरु थे।
- राजनीतिक घटनाएँ:
- सारंगपुर युद्ध (1437): महमूद खिलजी प्रथम को हराया।
- आंवल-बांवली संधि (1453-8): राव जोधा के साथ, सोजत सीमा मानी। हंसा बाई ने मध्यस्थता की। रायमल का श्रृंगार कंवर से विवाह।
- बदनोर युद्ध (1457): मालवा-गुजरात की संयुक्त सेना को हराया।
- सिरोही पर कब्जा, आबू हासिल किया।
- मृत्यु: 1468 में पुत्र उदयकरण (उदा) ने कुंभलगढ़ में हत्या की। उदा ‘पितृहन्ता’ कहलाया। दाड़िमपुर युद्ध में उदा हारा और मालवा में मर गया।
महाराणा रायमल (1473-1509 ई.)
- जोबा की पुत्री श्रृंगार देवी से विवाह। पुत्र: पृथ्वीराज, जयमल, सांगा। बेटी आनंदा बाई का विवाह सिरोही के जगमाल से हुआ।
- प्रमुख उपलब्धियाँ:
- चितौड़ में अद्भुतजी मंदिर और एकलिंग मंदिर का वर्तमान स्वरूप बनवाया।
- श्रृंगार दी ने घोसुण्डी बावड़ी (चितता) बनवायी।।
- खेति के लिए राम, शंकर, समयासंकट तालाब बनाए।
- दरबार में गोपाल भट्ट, महेश भट्ट, और शिल्पी अर्जुन।
- घटनाएँ:
- पृथ्वीरज का विवाह टोडा की तारा से; अजमेर का आजमेरु दुर्ग ‘तारगढ़’ नामित। पृथ्वीरज ‘उड़ना राजकुमार’ कहलाता था। जगमाल ने कुंभलगढ़ में विष देकर हत्या की। उनकी 12 खम्भों की छतरी (घषणपणा शिल्पी) कुंभलगढ़ में है।
- जयमल की सुरताण ने हत्या की।
- सांगा ने श्रीनगर (अजमेर) के करमचंद पंवार के पास शरण ली।
- महत्व: रायमल ने मेवा की सांस्कृतिक और कृषि विकास को बढ़ाया।
महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) (1509-1528 ई.)
- 25 मई 1509 को शासक बना। ‘हिन्दुपति’ के नाम से विख्यात।
- कर्नल टॉड: ‘सैनिक भग्नावशेष’ (80 घावों के कारण).
- विवाह: करमचंद पंवार (श्रीनगर, अजमेर) की पुत्री जसोदा कंवर से।
- सेना: टॉड के अनुसार, 7 राजा, 9 राव, 104 सरदार।
- समकालीन शासक:
- दिल्ली: सिकंदर लोदी, इब्राहिम लोदी, बाबर।
- मालवा: नासिरुद्दीन, महमूद खिलजी।
- गुजरात: महमूद बेगड़ा, मुजफ्फर शाह।
- प्रमुख युद्ध:
- खातोली (1517, कोटा): इब्राहिम लोदी को हराया।
- बांडी (1518, धौलपुर): पुनः इब्राहिम लोदी को हराया।
- गागरोन (1519, झालावाड़): महमूद खिलजी को हराया। हरिदास चारण को 12 गाँव भेंट।
- बयाना (1527, भरतपुर): बाबर की सेना (सुल्तान मिर्जा) को हराया।
- खानवा (1527, भरतपुर): बाबर ने हराया। कारण: सांगा की दिल्ली पर कब्जे की महत्वाकांक्षा। बाबर ने जिहाद घोषित किया, तमगा हटाया, शराब छोड़ी, तुलुग्मा युद्ध पद्धति और तोपखाने (उस्ताद अली, मुस्तफा अली खां) का उपयोग किया। पाती परवण प्रथा पुनर्जनन। सांगा ने राजपूत मैत्री संघ बनाया।
- खानवा में सहयोगी:
- हिंदू: कल्याणमल (बीकानेर), मालदेव (मारवाड़), भारमल (ईडर), वीरमदेव (मेड़ता), मेदिनी राय (चंदेरी), अशोक परमार (जगनेर), पृथ्वी सिंह (आमेर), उदय सिंह (वाग), झाला सज्जा (गोगुंदा), झाला अज्जा (सादड़ी), नारायण राव (बूंदी), अखेराज (सिरोही), बागा सिंह (देवलिया), रत्नसिंह (सलूम्बर).
- मुस्लिम: हसन खां मेवाती, महमूद लोदी।
- घटनाएँ:
- झाला अज्जा ने सांगा की जान बचाई और उनका मुकुट लेकर युद्ध लड़ा।
- मालदेव और अखेराज ने घायल सांगा को बसवा (दौसा) ले गए।
- मृत्यु: 30 जनवरी 1528, ईरिच (मध्य प्रदेश) में जहर देकर हत्या। कालपी (उत्तर प्रदेश) में निधन।
- स्मारक: बसवा (दौसा); छतरी (8 खम्भों) माण्डलगढ़ (भिल्वारा) में, अशोक परमार द्वारा निर्मित।
- पुत्र: भोजराज (मीराबाई से विवाह), रतन सिंह, विक्रमारदित्य, उदय सिंह।
- महत्व: सांगा ने राजपूत शक्ति को एकजुट किया और मेवा को शक्तिशाली बनाया।
गुहिल-सिसोदिया की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत
- एकलिंग जी मंदिर: बप्पा रावल द्वारा स्थापित, सिसोदिया शासकों ने इसका जीर्णोद्वार करवाया। एकलिंग प्रशस्ति में बप्पा की दंतकथाएँ हैं।
- चित्रकला और साहित्य: तेज सिंह के काल में मेवा चित्रशैली शुरू हुई; समर सिंह, कुम्भा, और सांगा के समय साहित्य और कला का विकास हुआ।
- शिल्पकला: आहड़ का वराह मंदिर, चितौड़ का श्यामा पार्श्वनाथ मंदिर, कुम्भा का विजय स्तम्भ, और रणकपुर जैन मंदिर इस वंश की स्थापत्य कला के नमूने हैं।
- सिक्के: गुहिल और बप्पा रावल के सिक्के उनकी आर्थिक समृद्धि को दर्शाते हैं।
मेवाड़ के सिसोदिया वंश: वीरता की गाथा
मेवाड़ की मिट्टी में शौर्य और बलिदान की कहानियाँ बसी हैं। सिसोदिया वंश के इन महाराणाओं ने अपनी आन-बान-शान के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया। चल, सुन ले इनकी गौरवगाथा!
महाराणा रतन सिंह (1528 – 1531 ई.)
- कौन थे?: महाराणा सांगा और रानी धनबाई के बेटे। सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ के राजा बने।
- क्या हुआ?: बूंदी के सूरजमल हाड़ा के साथ अहेरिया उत्सव में युद्ध हुआ। रतन सिंह ने वीरता दिखाई, लेकिन यहीं वीरगति को प्राप्त हुए।
- खास बात: छोटा सा शासन, पर मेवाड़ की शान बरकरार रखी।
महाराणा विक्रमादित्य (1536 – 1540 ई.)
- कौन थे?: महाराणा सांगा और हाड़ी रानी कर्णावती के बेटे। कर्णावती उनकी संरक्षिका थीं।
- चुनौतियाँ:
- मालवा और गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर दो बार हमला किया (1533 और 1534 ई.)।
- 1534 में कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजी, पर मदद न मिली। 1535 में चित्तौड़ का पतन हुआ।
- दूसरा साका: कर्णावती ने जौहर किया, देवलिया के बाघसिंह ने केसरीया।
- मीराबाई की कहानी:
- विक्रमादित्य ने मीराबाई को दो बार मारने की कोशिश की, पर नाकाम रहे।
- मीराबाई वृंदावन चली गईं, रविदास को गुरु बनाया।
- अंत:
- 1536 में दासी पुत्र बनवीर (कुंवर पृथ्वीराज की दासी पुतल दे का बेटा) ने विक्रमादित्य की हत्या की।
- बनवीर ने उदय सिंह को भी मारने की साजिश रची, लेकिन पन्नाधाय ने अपने बेटे चंदन की बलि देकर उदय सिंह को बचाया।
- कीरत बारी की मदद से उदय सिंह को कुम्भलगढ़ ले जाया गया, जहाँ आशा देवपुरा किलेदार थे।
- खास बात: मुश्किल दौर में भी मेवाड़ की मशाल जली रही।
बनवीर (1536 – 1540 ई.)
- कौन था?: विक्रमादित्य की हत्या कर चित्तौड़ की गद्दी हथियाने वाला दासी पुत्र।
- क्या किया?:
- नौलखा महल और तुलजा भवानी मंदिर बनवाया।
- लेकिन क्रूरता के कारण जनता में नफरत पैदा हुई।
- अंत: मारवाड़ के राव मालदेव की मदद से उदय सिंह ने बनवीर को हटाकर चित्तौड़ पर कब्जा किया।
- खास बात: मेवाड़ के इतिहास का एक काला पन्ना।
महाराणा उदय सिंह (1540 – 1572 ई.)
- कौन थे?: महाराणा सांगा और रानी कर्णावती के बड़े बेटे।
- शुरुआत:
- 1540 में मावली युद्ध में बनवीर को हराकर मेवाड़ का राजा बना।
- चुनौतियाँ:
- 1543 में अफगान शासक शेरशाह सूरी को चित्तौड़ की चाबियाँ सौंपीं, मेवाड़ का पहला शासक जो विदेशी अधीनता में आया।
- शेरशाह ने खवास खाँ को चित्तौड़ में रखा।
- 1557 में रंगराय वैश्या को लेकर अजमेर के हाजी खाँ से हरमाड़ा युद्ध हुआ।
- उपलब्धियाँ:
- 1559 में उदयपुर शहर बसाया और उदयसागर झील बनवाई।
- अकबर का हमला (1567-68):
- उदय सिंह ने मालवा के बाज बहादुर और मेड़ता के जयमल को शरण दी, जिससे अकबर नाराज हुआ।
- उदय सिंह गिरवा पहाड़ियों (उदयपुर) चले गए, जयमल और फत्ता को किला सौंपा।
- जयमल संग्राम बंदूक की गोली से घायल हुए, फिर कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठकर लड़े। कल्ला को ‘चार हाथों वाला देवता’ कहा गया।
- जयमल और फत्ता वीरगति को प्राप्त हुए। फूल कंवर (जयमल की बहन, फत्ता की रानी) ने 1568 में जौहर किया। यह चित्तौड़ का तीसरा साका था।
- फरवरी 1568 में अकबर ने चित्तौड़ पर कब्जा किया।
- अकबर ने आगरा और जूनागढ़ दुर्ग (बीकानेर) के बाहर जयमल और फत्ता की मूर्तियाँ लगवाईं, जिनका जिक्र फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने किया।
- अंत:
- 28 फरवरी 1572 को होली के दिन गोगुन्दा (उदयपुर) में उदय सिंह की मृत्यु हुई। उनकी छतरी यहीं है।
- जगमाल सिंह (मटियाणी रानी का बेटा) को युवराज बनाया, जबकि महाराणा प्रताप (जयवन्ती बाई के बेटे) ज्यादा योग्य थे।
- कर्नल टॉड का कथन: अगर सांगा और प्रताप के बीच उदय सिंह न होते, तो मेवाड़ का इतिहास और चमकता।
- खास बात: उदयपुर की नींव डालकर मेवाड़ को नई पहचान दी।
महाराणा प्रताप (1572 – 1597 ई.)
- जन्म: 9 मई 1540, ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, बादल महल (कटारगढ़), कुम्भलगढ़। बचपन का नाम कीका।
- गद्दी:
- राजमहल की क्रांति: उदय सिंह के चुने जगमाल को हटाकर सामंतों ने प्रताप को राजा बनाया।
- राज्याभिषेक: महादेव बावड़ी (गोगुन्दा) में हुआ। सलभर के कृष्णदास ने तलवार बांधी। विधिवत् अभिषेक कुम्भलगढ़ में, राव चन्द्रसेन (मारवाड़) शामिल हुए।
- अकबर की संधि कोशिशें:
- चार शिष्टमंडल भेजे:
- जलाल खाँ कोरची (नवंबर 1572)
- मिर्जा राजा मान सिंह (जून 1573)
- भगवंत दास (सितंबर 1573)
- टोडरमल (दिसंबर 1573, मुलाकात न हुई)
- प्रताप ने मान सिंह का सत्कार उदयसागर झील किनारे किया (राजरत्नाकर, अमरकाव्यम् वंशावली के अनुसार)।
- चार शिष्टमंडल भेजे:
- हल्दीघाटी युद्ध (18 जून 1576):
- अकबर की सेना का नेतृत्व: मान सिंह (आमेर)।
- प्रताप की योजना: कुम्भलगढ़ में बनी, नियंत्रण केंद्र केलवाड़ा (राजसमंद)।
- प्रताप की सेना:
- हरावल: हकीम खाँ सूर (एकमात्र मुस्लिम सेनापति, मकबरा खमनौर में)।
- चंदावल: राणा पूंजा।
- मुगल हरावल: जगन्नाथ कच्छवाहा।
- इतिहासकार: बदायूँनी (‘मुन्तखाब उल तवारीख’ में वर्णन)।
- युद्ध के नाम:
- मेवाड़ की थर्मोपल्ली (कर्नल टॉड)
- खमनौर युद्ध (अबुल फजल)
- गोगुन्दा युद्ध (बदायूँनी)
- बादशाह बाग (डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव)
- घटना:
- प्रताप घायल हुए, झाला मन्ना ने राजचिह्न धारण किया।
- चेतक (प्रताप का घोड़ा) घायल होकर बलीचा गाँव (राजसमंद) में मरा, वहाँ समाधि।
- प्रताप का हाथी: रामप्रसाद/लूणा (अकबर ने पीर प्रसाद नाम दिया)।
- मुगल हाथी: मरदाना/गजमुक्ता।
- मिहत्तर खाँ ने अकबर के आने की झूठी अफवाह फैलाई।
- परिणाम:
- मान सिंह प्रताप को अधीन न कर सका।
- अकबर ने उदयपुर और चित्तौड़ पर कब्जा कर उदयपुर का नाम मुहम्मदाबाद रखा।
- खास बात: राजसमंद में हर साल हल्दीघाटी महोत्सव।
- भामाशाह का योगदान:
- पाली के भामाशाह को प्रधानमंत्री बनाया।
- स्वर्ण मुद्राएँ देकर प्रताप की आर्थिक मदद की।
- कर्नल टॉड: भामाशाह को ‘मेवाड़ का कर्ण’ कहा।
- अकबर के हमले:
- शाहबाज खाँ ने कुम्भलगढ़ पर तीन बार (1577, 1578, 1579) हमला किया, नाकाम रहा।
- प्रताप ने कुम्भलगढ़ राव भाण सोनगरा को सौंपा, खुद छाछन पहाड़ियाँ (उदयपुर) गए।
- शेरपुर घटना (1580):
- अमर सिंह ने मुगल सेनापति अब्दुल रहीम की बेगमों को पकड़ा।
- प्रताप ने उन्हें सम्मान के साथ वापस भेजा।
- दिवेर युद्ध (1582):
- प्रताप की विजय की शुरुआत।
- प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, ईडर ने साथ दिया।
- गुरिल्ला युद्ध पद्धति का इस्तेमाल।
- कर्नल टॉड: ‘मेवाड़ का मैराथन’।
- अकबर का आखिरी हमला:
- 1585 में जगन्नाथ कच्छवाहा को भेजा।
- उनकी 32 खम्भों की छतरी माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) में।
- उपलब्धियाँ:
- प्रताप ने आमेर का मालपुरा (टोंक) छीना, झालरा तालाब और नीलकण्ठ महादेव मंदिर बनवाया।
- 1585-1597 तक चित्तौड़ और माण्डलगढ़ छोड़कर बाकी मेवाड़ पर कब्जा।
- 1585 में लूणा चावण्डिया को हराकर चावण्ड को राजधानी बनाया, चामुण्डा देवी मंदिर बनवाया।
- चावण्ड शैली का विकास, चित्रकार नासिरुद्दीन।
- अंत:
- 19 जनवरी 1597, 57 साल की उम्र में चावण्ड में निधन।
- छतरी (8 खम्भों वाली) बांडोली (उदयपुर) में।
- मोती मगरी (फतेहसागर झील, उदयपुर) में स्मारक।
- दरबारी विद्वान:
- हेमरत्न सूरी: ‘गोरा बादल की चौपाई’।
- चक्रपाणि मिश्र: राज्याभिषेक, विश्ववल्लभ, मुहुर्तमाला।
- सादुलनाथ त्रिवेदी: मण्डेर जागीर मिली।
- ताराचंद, माला सांदू, रामा सांदू।
- सहयोगी:
- कृष्णदास चूण्डावत (सलभर), रामशाह तोमर (ग्वालियर), हकीम खाँ सूर, पूंजा भील।
- कर्नल टॉड का कथन: ‘अरावली की हर घाटी प्रताप के वीर कार्यों, विजय या कीर्तियुक्त पराजय से पवित्र है।’
- खास बात: मेवाड़ केसरी जिन्होंने कभी मुगल अधीनता स्वीकार न की।
राणा अमर सिंह प्रथम (1597 – 1620 ई.)
- कौन थे?: महाराणा प्रताप और रानी अजबदे पंवार के बेटे।
- मुगल चुनौतियाँ:
- 1599 में अकबर ने जहाँगीर की अगुआई में सेना भेजी, लेकिन उटाला में मेवाड़ ने हराया।
- 1605 में जहाँगीर ने परवेज, आसिफ खाँ, जफर बेग, सगर को भेजा, नाकाम रहे।
- 1608 में महावत खाँ, 1609 में अब्दुल्ला, 1612 में राजा बासू, 1613 में मिर्जा अजीज कोका भी हारे।
- 1613 में जहाँगीर खुद अजमेर आया, खुर्रम (शाहजहाँ) को मेवाड़ अभियान सौंपा।
- मुगल-मेवाड़ संधि (1615):
- 5 फरवरी 1615 को जहाँगीर और अमर सिंह के बीच संधि।
- मेवाड़ से हरिदास और शुभकरण ने प्रस्ताव रखा।
- खुर्रम और अमर सिंह ने हस्ताक्षर किए।
- शर्तें:
- युवराज कर्ण सिंह जहाँगीर के दरबार गए, 5000 का मनसबदार बने।
- मेवाड़ 1000 घुड़सवार देगा, कोई वैवाहिक संबंध नहीं।
- नतीजा: मेवाड़ में शांति, कलात्मक गतिविधियाँ बढ़ीं।
- उपलब्धियाँ:
- आगरा किले में अमर सिंह और कर्ण सिंह की मूर्तियाँ लगीं।
- चावण्ड चित्रकला शैली का स्वर्णकाल।
- अंत:
- 26 जनवरी 1620 को आहड़ (उदयपुर) में निधन।
- आहड़ की पहली छतरी अमर सिंह की।
- आहड़: मेवाड़ के महाराणाओं का शमशान।
- खास बात: शांति और कला को बढ़ावा देने वाला वीर शासक।
राणा कर्ण सिंह (1620 – 1628 ई.)
- कौन थे?: अमर सिंह प्रथम के बेटे।
- उपलब्धियाँ:
- पिछोला झील में जगमंदिर का निर्माण शुरू।
- 1623 में शाहजहाँ को जगमंदिर में शरण दी, जहाँ गफुर बाबा की मजार बनी।
- उदयपुर में दिलखुश महल और कर्ण विलास बनवाए।
- खासियत: मुगलों के आंतरिक मामलों में रुचि लेने वाला मेवाड़ का पहला शासक।
- खास बात: शांति और निर्माण का दौर।
राणा जगत सिंह प्रथम (1628 – 1652 ई.)
- कौन थे?: कर्ण सिंह के उत्तराधिकारी।
- चुनौतियाँ:
- शाहजहाँ ने प्रतापगढ़ और शाहपुरा को मेवाड़ से अलग किया।
- उपलब्धियाँ:
- जगमंदिर का निर्माण पूरा।
- उदयपुर में जगदीश मंदिर (जगन्नाथ राय मंदिर) बनवाया, जिसे ‘सपने का मंदिर’ कहते हैं।
- वास्तुकार: अर्जुन, भाणा, मुकुंद।
- जगन्नातराय प्रशस्ति (कृष्णभट्ट लिखी) से हल्दीघाटी की जानकारी।
- मोहन मंदिर, रूप सागर तालाब बनवाया।
- धाय माँ नौबूबाई ने धाय मंदिर बनवाया।
- चित्रशाला विभाग शुरू, मेवाड़ चित्रकला का स्वर्णकाल।
- चित्रों की ओबरी (‘तस्वीरां रो कारखाना’) बनवाया।
- खासियत: दानवीरता के लिए मशहूर।
- खास बात: कला और धर्म का दौर चमक रहा।
महाराणा राज सिंह (1652 – 1680 ई.)
- कौनशुरु?: 10 अक्टूबर 1652 को राज्याभिषेक।
- उपलब्धियाँ:
- तुलादान: ब्राह्मणों को रत्नों का तुलादान, पहला ऐसा शासक।
- उपाधि: विजय कटकातु।
- चित्तौड़गढ़ किले की मरम्मत शुरू।
- हाइड्रॉलिक रूलर:
- 1662-1676 में राजसमंद झील (राजसमुद्र) बनवाया।
- नींव: घेवर माता।
- राज प्रशस्ति: रणछोड़ भट्ट तैलंग का संस्कृत शिलालेख, बप्पा रावल से राज सिंह तक की जानकारी।
- अमर काव्य वंशावली: शक्ति सिंह, चेतक का जिक्र।
- मंदिर निर्माण:
- उदयपुर में अम्बामाता मंदिर।
- नाथद्वारा में श्रीनाथ मंदिर (1672 में गोविंददास, दामोदरदास मूर्ति लाए)।
- कांकरोली में द्वारकाधीश मंदिर।
- रामरसदे (पत्नी) ने त्रिमुखी बावड़ी बनवाया।
- धींगा गणगौर: वैशाख कृष्ण तृतीया से शुरू।
- मुगल संबंध:
- औरंगजेब का साथ, 6000 का मनसब, डूंगरपुर-बांसवाड़ा उपहार में।
- चारूमति (किशनगढ़ राजकुमारी) से विवाह, औरंगजेब से देसूरी की नाल युद्ध।
- रतन सिंह चुंडावत (सलूम्बर) ने लड़ा।
- हाड़ी रानी सहल कंवर ने सिर भेजा, विजय मिली।
- मेघराज मुकुल की कविता ‘सैनाणी’।
- 1679 में जजिया कर का विरोध, हिंदू मूर्तियों की रक्षा।
- टीका दौड़ आयोजित, कई मुगल क्षेत्र हथियाए।
- राठौड़-सिसोदिया गठबंधन (1680):
- दुर्गादास राठौड़ के साथ, अजीत सिंह को मारवाड़ का शासक बनाने का लक्ष्य।
- केलवा जागीर दी।
- दरबारी विद्वान:
- किशोर दास: ‘राजप्रकाश’।
- सदाशिव भट्ट: ‘राज रत्नाकर’।
- अंत: 1680 में कुम्भलगढ़ में निधन।
- खास बात: धर्म, कला, और शौर्य का अनोखा संगम।
महाराणा जयसिंह (1680 – 1698 ई.)
- उपलब्धियाँ:
- 24 जून 1681: दूसरी मेवाड़-मुगल संधि (शाहजादा मुअज्जम)。
- 1687-1691: जयसमंद झील (ढेबर झील) बनवाया।
- नदियाँ: गोमती, झामरी, रूपारेल, बागर।
- राजस्थान की सबसे बड़ी कृत्रिम मीठे पानी की झील।
- टापू: बाबा का मगरा, पायरी।
- खास बात: जल संरक्षण और शांति का दौर।
महाराणा अमर सिंह द्वितीय (1698 – 1710 ई.)
- उपलब्धियाँ:
- 1708 में देबारी समझौता:
- मेवाड़ (अमर सिंह), मारवाड़ (अजीत सिंह), आमेर (सवाई जयसिंह)।
- मुगल (बहादुरशाह प्रथम) के खिलाफ।
- पुत्री इन्द्रकुंवरी का विवाह सवाई जयसिंह (जयपुर) से।
- मदिरा प्रचलन शुरू।
- 1708 में देबारी समझौता:
- खास बात: गठबंधन और राजनीतिक चतुराई का दौर।
महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (1710 – 1734 ई.)
- चुनौतियाँ:
- मराठों का मेवाड़ में प्रवेश, चौथ कर वसूला।
- हुरड़ा सम्मेलन की योजना (सवाई जयसिंह), पर निधन से पहले अधूरी।
- उपलब्धियाँ:
- दुर्गादास राठौड़ को विजयपुर जागीर।
- रामपुरा, ईडर को मेवाड़ में मिलाया।
- फर्रूखसियार ने जजिया कर हटाया।
- उदयपुर में चीनी चित्रशाला।
- मेवाड़ चित्रशैली में ‘कलीला दमना’ चित्रण।
- जगदीश मंदिर का पुनर्निर्माण।
- फतेहसागर झील किनारे सहेलियों की बाड़ी।
- सीसरमा में वैद्यनाथ मंदिर, वैद्यनाथ प्रशस्ति (रूपभट्ट), बांदनवाड़ा युद्ध की जानकारी।
- कर्नल टॉड का कथन: बप्पा रावल की गद्दी का गौरव बनाए रखने वाला आखिरी राजा।
- खास बात: कला, संस्कृति, और शौर्य का संतुलन।
महाराणा जगत सिंह द्वितीय (1734 – 1751 ई.)
- चुनौतियाँ:
- पेशवा बाजीराव प्रथम ने चौथ वसूली का समझौता किया।
- जयपुर के उत्तराधिकार संघर्ष में माधो सिंह का साथ।
- उपलब्धियाँ:
- पिछोला झील में जगनिवास महल बनवाया।
- नेकराम (दरबारी कवि) ने ‘जगत विलास’ लिखा।
- 17 जुलाई 1734: हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता, पर असफल।
- घटनाएँ:
- 1739 में नादिरशाह का दिल्ली पर हमला।
- कर्नल टॉड का कथन: विलासी, अस्थिर, अयोग्य शासक।
- खास बात: मराठों के दबाव में भी मेवाड़ की शान बरकरार।
महाराणा अरि सिंह द्वितीय (1761 – 1773 ई.)
- चुनौतियाँ:
- सरदारों ने रतन सिंह (राजमाता झाली का पुत्र) को उत्तराधिकारी घोषित किया।
- उपलब्धियाँ:
- सिंध, गुजरात से सैनिक भर्ती।
- अंत:
- 9 मार्च 1773 को बूंदी के अजीत सिंह ने शिकार के दौरान धोखे से मरवाया।
- उत्तराधिकारी: हम्मीर द्वितीय (1773-1778), 1778 में बंदूक दुर्घटना में मृत्यु।
- खास बात: अस्थिर दौर, पर मेवाड़ की मशाल जली।
महाराणा भीम सिंह (1778 – 1828 ई.)
- उपलब्धियाँ:
- 13 जनवरी 1818: अंग्रेजों से संधि (मराठों के डर से)।
- हस्ताक्षर: अजीत सिंह (आसींद), चार्ल्स मैटकॉफ (अंग्रेज)।
- पदमेश्वरी (रानी) ने भीमपदेश्वर शिवालय बनवाया।
- भौमगढ़, टॉडगढ़ दुर्ग बने।
- किसना आढ़ा (चारण) ने ‘भीम विलास’ लिखा।
- 13 जनवरी 1818: अंग्रेजों से संधि (मराठों के डर से)।
- घटनाएँ:
- 1807: कृष्णा कुमारी के विवाह को लेकर जोधपुर (मान सिंह) और जयपुर (जयसिंह द्वितीय) में गिंगोली युद्ध।
- जयसिंह जीता, पर कृष्णा कुमारी को अमीर खाँ पिण्डारी और अजीत सिंह चुंडावत की सलाह पर जहर दिया गया।
- फरवरी 1818: कर्नल जेम्स टॉड उदयपुर में एजेंट बने।
- 1807: कृष्णा कुमारी के विवाह को लेकर जोधपुर (मान सिंह) और जयपुर (जयसिंह द्वितीय) में गिंगोली युद्ध।
- खास बात: अंग्रेजों से संधि का दौर।
महाराणा सरदार सिंह (1838 – 1842 ई.)
- कौन थे?: बागौर ठिकाने से गोद लिए गए।
- उपलब्धियाँ:
- 1841: मेवाड़ भील कोर गठन, खैरवाड़ा (उदयपुर) में मुख्यालय।
- 1950 में राजस्थान पुलिस में विलय।
- 1841: मेवाड़ भील कोर गठन, खैरवाड़ा (उदयपुर) में मुख्यालय।
- खास बात: जनजातीय उपद्रव नियंत्रित किए।
महाराणा स्वरूप सिंह (1842 – 1861 ई.)
- कौन थे?: सरदार सिंह का छोटा भाई।
- उपलब्धियाँ:
- 1857 की क्रांति में अंग्रेजों का साथ, राजपूताना का पहला शासक।
- स्वरूपशाही सिक्के: ‘चित्रकूट उदयपुर’ और ‘दोस्ती लंदन’ लिखे।
- विजय स्तंभ का जीर्णोद्धार।
- सामाजिक सुधार:
- 1844: कन्या वध पर रोक।
- 1861: सती प्रथा पर रोक।
- 1853: डाकन प्रथा, समाधि प्रथा पर रोक।
- अंत:
- 1861 में निधन, ऐंजाबाई सती हुई (मेवाड़ की आखिरी सती)।
- खास बात: सुधारों और अंग्रेज समर्थन का दौर।
राणा शंभू सिंह (1861 – 1874 ई.)
- कौन थे?: बागौर ठिकाने से गोद लिए गए।
- उपलब्धियाँ:
- नाबालिग होने पर रीजेंसी कौंसिल (मेजर टेलर) गठित।
- 1863: शंभूरत्न पाठशाला (उदयपुर)।
- शंभू पलटन: नई सेना।
- श्यामलदास ने ‘वीर विनोद’ लेखन शुरू।
- सामाजिक सुधार: सती, दास प्रथा, बच्चों का क्रय-विक्रय पर रोक।
- मृत्यु पर कोई रानी सती नहीं हुई, पहला ऐसा शासक।
- लॉर्ड रिपन: ‘ग्रैंड कमांडर ऑफ दी स्टार ऑफ इंडिया’ उपाधि।
- चुनौतियाँ:
- 1864: चम्पालाल (नगर सेठ) की अगुआई में हड़ताल (नई अदालतों के खिलाफ)।
- खास बात: शिक्षा और सुधारों का युग।
राणा सज्जन सिंह (1874 – 1884 ई.)
- कौन थे?: बागौर के शक्तिसिंह के पुत्र।
- उपलब्धियाँ:
- 14 फरवरी 1878: अंग्रेजों से नमक समझौता।
- वायसराय लॉर्ड नॉर्थब्रुक उदयपुर आए।
- 1881: लॉर्ड रिपन चित्तौड़ आए, जी.सी.एस.आई. खिताब।
- सज्जन निवास: सुंदर बाग।
- शिक्षा: एजुकेशन कमेटी।
- स्वास्थ्य: सज्जन अस्पताल, वॉल्टर जनाना अस्पताल।
- भू-राजस्व: जमीन पैमाइश, नया बंदोबस्त।
- 1881: प्रथम जनगणना।
- इजलास खास: दिवानी, फौजदारी, अपील परिषद।
- 1880: महेंद्राज सभा: शासन, न्याय।
- 1881: सज्जन यंत्रालय (छापाखाना), ‘सज्जन कीर्ति सुधारक’ साप्ताहिक।
- सज्जन वाणी विलास पुस्तकालय।
- श्यामलदास को ‘कविराज’ उपाधि।
- घटनाएँ:
- लॉर्ड लिटन के दिल्ली दरबार में भाग लिया, पहला मेवाड़ शासक।
- दयानंद सरस्वती मेवाड़ आए, सत्यार्थ प्रकाश लेखन (जगमंदिर)।
- आर्य समाज सभापति बने।
- सज्जनगढ़ पैलेस (बोसदरा) शुरू, फतेह सिंह ने पूरा किया।
- खास बात: आधुनिकीकरण और संस्कृति का संगम।
महाराणा फतेह सिंह (1884 – 1930 ई.)
- कौन थे?: शिवरती के दलसिंह के पुत्र।
- उपलब्धियाँ:
- सामाजिक सुधार: बहुविवाह, बालविवाह, फिजूलखर्ची पर रोक।
- केनॉट बाँध (फतेहसागर): राजकुमार केनॉट ने नींव रखी।
- फतेहसागर झील बनवाया।
- उपाधि: ऑर्डर ऑफ क्राउन ऑफ इंडिया।
- 1889: वॉल्टर ने राजपूत हितकारिणी सभा शुरू।
- घटनाएँ:
- बिजोलिया किसान आंदोलन शुरू।
- 1903: एडवर्ड सप्तम के दरबार में जाने से पहले केसरी सिंह बारहठ के ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ (13 सोरठे) से प्रभावित, दरबार में नहीं गए।
- खास बात: स्वाभिमान और सुधारों का युग।
राणा भूपाल सिंह (1930 – 1947 ई.)
- कौन थे?: सिसोदिया वंश का आखिरी शासक।
- उपलब्धियाँ:
- राजस्थान एकीकरण हुआ।
- 18 अप्रैल 1948: उदयपुर रियासत का संयुक्त राजस्थान में विलय।
- आजीवन महाराज प्रमुख रहे, राजस्थान का एकमात्र शासक।
- घटनाएँ:
- बिजोलिया, बेंगू किसान आंदोलन, प्रजामंडल आंदोलन।
- स्वतंत्रता के समय मेवाड़ के शासक।
- खास बात: मेवाड़ का अंतिम गौरव, आधुनिक भारत की नींव।





