भारत में मृदा का वर्गीकरण 2025: प्रकार, विशेषताएँ और संरक्षण 🌱

By: LM GYAN

On: 5 September 2025

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भारत में मृदा का वर्गीकरण

भारत में मृदा का वर्गीकरण 🌱 जलोढ़, काली, लैटेराइट, और अन्य मृदाओं के आधार पर किया जाता है। जानें इनके प्रकार, विशेषताएँ, और मृदा संरक्षण के उपाय।


परिचय: मृदा क्या है? 🌍

मृदा भूमि की वह परत है, जो चट्टानों के विघटन और जीवाश्मों के सड़ने-गलने से बनती है। 🌿 इसमें पेड़-पौधों को उगाने की क्षमता होती है। इसका निर्माण और गुण चट्टानों, जलवायु, और वनस्पति पर निर्भर करते हैं।

  • मृदा निर्माण के कारक:
    • उच्चावच: भू-आकृति और ढाल।
    • जनक सामग्री: मूल चट्टानें।
    • जलवायु: वर्षा और तापमान। 🌧️
    • वनस्पति: जैव पदार्थों का योगदान। 🌳
    • समय: मृदा विकास की अवधि। ⏳
    • मानवीय क्रियाएँ: कृषि, सिंचाई, और वनों की कटाई। 🚜

विभिन्न भौगोलिक वातावरण में अलग-अलग प्रकार की मृदा विकसित होती हैं, जो भारत की कृषि और पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। आइए, भारत में मृदा का वर्गीकरण विस्तार से जानें! 🚀


मृदा के प्रकार: उत्पत्ति के आधार पर 📊

भारत में मृदा को उसके निर्माण और स्थान के आधार पर दो प्रमुख श्रेणियों में बाँटा गया है:

1. स्थानीय मृदा 🌄

  • परिभाषा: जब चट्टानों के विखंडन से बनी मृदा अपने मूल स्थान पर रहती है या बहुत कम हटती है।
  • विशेषताएँ:
    • मूल चट्टानों के गुण मृदा में विद्यमान रहते हैं।
    • ऋतु क्रिया के प्रभाव से निर्मित।
  • वितरण: दक्षिण भारत के पठारों पर पाई जाती है। 🌋

2. विस्थापित मृदा 🌊

  • परिभाषा: जब नदी, हिमनद, या पवन के प्रभाव से चट्टानों से बनी मृदा अपने मूल स्थान से दूर चली जाती है
  • विशेषताएँ:
    • अत्यधिक उपजाऊ।
    • भारत के मध्यवर्ती मैदानों और तटीय मैदानों में पाई जाती है।
  • उदाहरण: गंगा के मैदान, तटीय क्षेत्र। 🌾

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (I.C.A.R) का वर्गीकरण 🌟

1956 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (I.C.A.R) ने भारत में मृदा को संरचनात्मक, खनिज, रंग, और संसाधनात्मक महत्व के आधार पर आठ वर्गों में विभाजित किया:

  1. जलोढ़ मृदा 🌊
  2. काली या रेगुर मृदा 🌑
  3. लाल-पीली मृदा 🟡
  4. लैटेराइट मृदा 🟤
  5. पर्वतीय या वनीय मृदा 🏔️
  6. मरुस्थलीय या शुष्क मृदा 🏜️
  7. लवणीय मृदा 🧂
  8. पीट एवं जैव मृदा 🌱

मृदा की संरचना: ऊर्ध्वाकर परिच्छेदिका 📏

मृदा की ऊर्ध्वाकर परिच्छेदिका में तीन संस्तर (Horizons) पाए जाते हैं:

  • A संस्तर (Eluvial/Leaching Zone):
    • सबसे ऊपरी परत।
    • बारीक पदार्थों और जैव पदार्थों से निर्मित। 🌿
    • पौधों को पोषण प्रदान करता है।
  • B संस्तर (Illuvial/Accumulation Zone):
    • मध्य परत।
    • खनिजों और पदार्थों का संचयन।
  • C संस्तर:
    • अपक्षयित शिला चूर्ण से बना।
    • सबसे नीचे मूल चट्टानें, जो मृदा निर्माण से अप्रभावित रहती हैं। 🪨

भारत में मृदा के प्रकार: विस्तृत विश्लेषण 🌍

1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) 🌊

  • निर्माण: नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से।
  • वितरण:
    • उत्तरी मैदान: गंगा, ब्रह्मपुत्र।
    • तटीय क्षेत्र: पूर्वी और पश्चिमी तट।
    • प्रायद्वीपीय भारत: नदी घाटियों में सीमित क्षेत्र।
  • नाम: काँप मृदा
  • क्षेत्र: देश के 40% भू-भाग पर विस्तार।
  • विशेषताएँ:
    • कमी: नाइट्रोजन, फास्फोरस, और ह्यूमस।
    • प्रचुरता: पोटाश और चूना।
    • उपजाऊपन: विभिन्न चट्टानी खनिजों के कारण अत्यधिक उपजाऊ। 🌾
    • फसलें: गेहूँ, चावल, गन्ना, जूट, दलहन।
    • तराई क्षेत्र: बालू, क्ले, और कंकड़।

जलोढ़ मृदा के प्रकार 📝

  • (a) पुरातन काँप मृदा (Bangar):
    • वितरण: सतलज-यमुना मैदान, पंजाब, हरियाणा, ऊपरी गंगा मैदान।
    • विशेषताएँ:
      • गहरा रंग।
      • चूने की गांठें (कंकड़)।
      • बाढ़ क्षेत्रों से ऊँचे भागों में।
    • फसलें: गेहूँ, गन्ना, जौ (रबी)। 🌾
  • (b) नूतन काँप मृदा (Khadar):
    • वितरण: मध्य और निम्न गंगा मैदान।
    • विशेषताएँ:
      • नदियों द्वारा नई मृदा परत का जमाव।
      • बांगर से अधिक उपजाऊ।
      • हल्का रंग।
    • फसलें: चावल, जूट (खरीफ)। 🌾
  • (c) नूतनतम काँप मृदा (Newest Alluvium):
    • वितरण: गंगा, ब्रह्मपुत्र डेल्टा, तटीय मैदान।
    • विशेषताएँ:
      • चूना, मैग्नीशियम, पोटाश, फास्फोरस, और जीवांश की प्रचुरता।
      • कृषि के लिए अत्यधिक उपयोगी। 🌱

2. काली या रेगुर मृदा 🌑

  • निर्माण: बेसाल्ट चट्टानों के विखंडन से।
  • विशेषताएँ:
    • रंग: टिटानिफेरस मैग्नेटाइट लवणों के कारण काला।
    • संरचना: बारीक कण, सूखने पर सिकुड़ती है, गीली होने पर फूलती है।
    • स्वत: जुताई: दरारों के कारण मृदा स्वयं जुताई करती है।
    • जलधारण क्षमता: उच्च।
    • खनिज:
      • प्रचुरता: लोहा, एल्यूमिनियम, पोटाश, चूना।
      • कमी: नाइट्रोजन, फास्फोरस, ह्यूमस।
    • उपनाम: काली कपासी मृदा (कपास के लिए उपयुक्त)।
  • फसलें: कपास, गन्ना, मूंगफली, तंबाकू, फल। 🌱
  • वितरण: महाराष्ट्र, मालवा पठार, तेलंगाना पठार, उत्तरी कर्नाटक, उत्तर-पश्चिम तमिलनाडु, दक्षिण-पूर्वी गुजरात। 🌄

3. लाल-पीली मृदा 🟡

  • निर्माण: प्राचीन और रूपांतरित चट्टानों के अपक्षय और अपरदन से।
  • वितरण:
    • मध्य प्रदेश (पूर्वी भाग), बिहार (दक्षिणी भाग), छोटा नागपुर पठार।
    • पश्चिम बंगाल (वीरभूमि, बांकुड़ा, मिदनापुर)।
    • मेघालय (गारो, खासी, जयंतिया पहाड़ियाँ), नागालैंड।
    • उत्तर प्रदेश (हमीरपुर, मिर्जापुर, बांदा, झाँसी), राजस्थान (अरावली के पूर्वी क्षेत्र), दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु। 🌄
  • विशेषताएँ:
    • खनिज:
      • प्रचुरता: लोहा, एल्यूमिनियम, चूना।
      • कमी: ह्यूमस, फास्फोरस, नाइट्रोजन।
    • रंग: भूरा, काला, चॉकलेटी, पीला, या लाल।
    • उपजाऊपन:
      • बारीक कणों वाली मृदा उपजाऊ।
      • पानी न रुकने के कारण अन्य क्षेत्र बंजर।
  • फसलें: बाजरा, मोटे अनाज, दलहन, चावल। 🌾

4. लैटेराइट मृदा 🟤

  • नाम: लैटिन शब्द ‘लेटर’ (ईंट) से।
  • निर्माण: उच्च तापमान और भारी वर्षा में तीव्र निक्षालन से। 🌧️
  • विशेषताएँ:
    • चूना और सिलिका निक्षालित।
    • लौह ऑक्साइड और एल्यूमिनियम यौगिकों की प्रचुरता।
    • कमी: ह्यूमस, नाइट्रोजन, फास्फोरस, कैल्सियम।
    • प्रचुरता: लौह ऑक्साइड, पोटाश।
    • कृषि: कम उपजाऊ, खाद और उर्वरकों की आवश्यकता।
    • उपयोग: काजू की खेती, ईंट निर्माण। 🏠
  • वितरण: कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा, असम के पहाड़ी क्षेत्र। 🌄

5. पर्वतीय या वनीय मृदा 🏔️

  • वितरण: हिमालय, उत्तर-पूर्वी भारत, प्रायद्वीपीय पहाड़ी क्षेत्र।
  • विशेषताएँ:
    • पतली परत (पर्वतीय ढालों के कारण)।
    • वर्षा की अधिकता से अम्लीय
    • फसल: चाय की खेती के लिए उपयुक्त। 🍵

6. मरुस्थलीय या शुष्क मृदा 🏜️

  • वितरण: राजस्थान, दक्षिण-पश्चिमी पंजाब, दक्षिण-पश्चिमी हरियाणा।
  • विशेषताएँ:
    • वर्षा: 50 सेमी से कम।
    • संरचना: बालू की अधिकता, ह्यूमस की कमी।
    • खनिज:
      • प्रचुरता: लोहा, फास्फोरस।
      • कमी: नाइट्रोजन, पोटाश, ह्यूमस।
    • उपजाऊपन: कम उपजाऊ, सिंचाई से उर्वरता बढ़ती है।
  • फसलें: गन्ना, कपास, ज्वार-बाजरा, सब्जियाँ (सिंचित क्षेत्रों में)। 🌾

7. लवणीय मृदा 🧂

  • नाम: ऊसर मृदा।
  • विशेषताएँ:
    • खनिज: सोडियम, पोटाश, मैग्नीशियम की अधिकता।
    • कमी: नाइट्रोजन, चूना।
    • उपजाऊपन: अनुपजाऊ, वनस्पति नहीं उगती।
  • वितरण:
    • पश्चिमी गुजरात, पूर्वी तट के डेल्टा, पश्चिम बंगाल (सुंदरबन)।
    • कच्छ के रण (मानसून के साथ नमक जमा)।
  • विकास:
    • शुष्क, अर्ध-शुष्क, जलाक्रांत, और अनूप क्षेत्र।
    • अत्यधिक सिंचाई से जलोढ़ मृदा भी लवणीय हो जाती है।
  • समाधान: जिप्सम का उपयोग। ⚙️

8. पीट एवं जैव मृदा 🌱

  • वितरण: बिहार (उत्तरी भाग), उत्तराखंड (दक्षिणी भाग), पश्चिम बंगाल (तटीय), ओडिशा, तमिलनाडु।
  • विशेषताएँ:
    • भारी वर्षा और उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्र।
    • जैव पदार्थ: 40–50%।
    • गहरा और काला रंग, कुछ क्षेत्रों में क्षारीय।
    • मृत जैव पदार्थों से ह्यूमस की प्रचुरता। 🌿

I.C.A.R द्वारा USDA मृदा वर्गीकरण 📝

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (I.C.A.R) ने USDA मृदा वर्गीकरण के आधार पर भारत में मृदा को निम्नलिखित क्रम में वर्गीकृत किया:

  1. इंसेप्टीसोल्स:
    • विशेषताएँ:
      • अल्पविकसित मृदा।
      • जलोढ़ मैदान, पर्वतीय, और घाटी क्षेत्र।
      • उच्च जलधारण क्षमता।
      • उपजाऊ। 🌾
  2. एंटीसोल्स:
    • विशेषताएँ:
      • अपरिपक्व मृदा।
      • पवन या भौतिक कारकों से निर्मित।
      • मरुस्थलीय क्षेत्र। 🏜️
  3. एल्फीसोल्स:
    • विशेषताएँ:
      • आंशिक निक्षालित।
      • एल्यूमिनियम, लोहा, कैल्सियम, मैग्नीशियम, पोटाश की प्रचुरता।
      • लाल और उपजाऊ।
      • आर्द्र और उप-आर्द्र क्षेत्र। 🌱
  4. वर्टीसोल्स:
    • विशेषताएँ:
      • मृण्मय काली मृदा।
      • उच्च जलधारण क्षमता।
      • स्वत: जुताई। 🌑
  5. एरीडीसोल्स:
    • विशेषताएँ:
      • शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र।
      • चूना, फास्फोरस की प्रचुरता।
      • नाइट्रोजन, पोटाश, ह्यूमस की कमी।
      • कम जलधारण क्षमता। 🏜️
  6. अल्टीसोल्स:
    • विशेषताएँ:
      • उष्णकटिबंधीय क्षेत्र।
      • निक्षालित मृदा।
      • लौह और एल्यूमिनियम ऑक्साइड की प्रचुरता। 🟤
  7. मॉलीसोल्स:
    • विशेषताएँ:
      • शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र।
      • ह्यूमस की प्रचुरता।
      • गहरा रंग, चरनोजम मृदा। 🌿

मृदा से संबंधित समस्याएँ 😓

भारत में मृदा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाली प्रमुख समस्याएँ हैं:

  1. लवणीयता और क्षारीयता:
    • वितरण: पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश (नहर सिचित क्षेत्र), राजस्थान (शुष्क), महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक (अर्ध-शुष्क), पूर्वी-पश्चिमी तट।
    • कारण: सोडियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम लवणों का केशिका क्रिया द्वारा सतह पर जमाव।
    • प्रभाव: मृदा ऊसर होकर अनुपजाऊ। 🧂
  2. जललग्नता (Waterlogging):
    • कारण:
      • त्रुटिपूर्ण अपवाह।
      • अत्यधिक वर्षा।
      • भौमजल स्तर का उन्नयन।
      • अधिक सिंचाई। 🌊
    • प्रभाव: मृदा की उर्वरता में कमी।
  3. मृदा अपरदन:
    • परिभाषा: जल या पवन द्वारा मृदा की ऊपरी परत का कटाव।
    • प्रकार:
      • पवन अपरदन:
        • मरुस्थलीय क्षेत्रों (थार मरुस्थल, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब) में बालू और मृदा कणों का उड़ना।
        • खेती योग्य भूमि की उर्वरता नष्ट। 🏜️
      • परतदार अपरदन:
        • जल की परत द्वारा मृदा का बहाव।
        • नदी घाटियों और बाढ़ क्षेत्रों में।
      • नदिका अपरदन:
        • वर्षा में छोटी सरिताओं द्वारा मृदा का निष्कासन।
        • गहराई कुछ सेंटीमीटर।
      • अवनालिका अपरदन:
        • जल के नालियों में बहने से मृदा का कटाव।
        • उत्खात भूमि: यमुना और चंबल नदियों द्वारा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में। 🪨
    • अन्य कारक:
      • भूमि का अत्यधिक दोहन
      • अतिचारण
      • मृदा प्रदूषण
  4. मरुस्थलीकरण:
    • परिभाषा: मरुस्थल का प्रसार।
    • वितरण: उत्तर-पश्चिमी भारत, प्रायद्वीपीय पठार (वृष्टिछाया क्षेत्र)। 🏜️

मृदा संरक्षण के उपाय 🌿

मृदा एक अनवीकरणीय संसाधन है, जिसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। निम्नलिखित उपाय मृदा संरक्षण में सहायक हैं:

  • वन संरक्षण:
    • वनों की अंधाधुंध कटाई रोकें।
    • वृक्षों की जड़ें मृदा को बांधती हैं। 🌳
    • मृदा निर्माण की प्रक्रिया तेज।
  • वृक्षारोपण:
    • नदी घाटियों, बंजर भूमि, और पहाड़ी ढालों पर वृक्ष लगाएँ।
    • मरुस्थलीय क्षेत्रों में रेत के प्रसार को रोके। 🌱
    • उदाहरण: थार मरुस्थल (राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, पंजाब)।
  • बाढ़ नियंत्रण:
    • नदियों पर बाँध बनाएँ।
    • जल को नहरों द्वारा सुखाग्रस्त क्षेत्रों में मोड़ें। 🌊
  • नियोजित चराई:
    • अत्यधिक चराई से मृदा ढीली होती है।
    • नियोजित चराई से वनस्पति आवरण सुरक्षित। 🐄
  • बंध बनाना:
    • अवनालिका अपरदन रोकने के लिए बंध या अवरोध।
    • मृदा उर्वरता और जल संरक्षण में सहायक। ⚙️
  • सीढ़ीदार खेती:
    • पर्वतीय ढालों पर समतल चबूतरे।
    • मृदा अपरदन रुकता है, जल का समुचित उपयोग। 🌾
  • समोच्चरेखीय जुताई:
    • समान ऊँचाई पर जुताई।
    • मृदा अपरदन और उर्वरता बनाए रखने में सहायक। 🚜
  • कृषि की पट्टीदार विधि:
    • खेतों को पट्टियों में बाँटें।
    • एक पट्टी में खेती, दूसरी में वनस्पति आवरण।
    • मरुस्थलीय और अर्ध-मरुस्थलीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त। 🌱
  • शस्यावर्तन:
    • विभिन्न फसलों को बारी-बारी बोना।
    • मृदा उर्वरता बनी रहती है। 🌾
  • भूमि उद्धार:
    • उत्खात भूमियों को समतल करना।
    • चंबल और यमुना नदियों के क्षेत्रों में उपयोगी। 🪨
  • मल्च बनाना (Mulching):
    • अनावृत भूमि को जैव पदार्थों से ढकना।
    • नमी संरक्षण और अपरदन रोकथाम। 🌿
  • कंटूर कृषि और समोच्च रेखीय रोधिकाएँ:
    • पत्थर या मृदा से रोधिका और खाई बनाना।
    • ढाल वाले क्षेत्रों में अपरदन कम। ⚙️
  • समोच्च रेखीय जुताई (Contour Ploughing):
    • समोच्च रेखा के समानांतर जुताई।
    • मृदा संरक्षण। 🚜
  • वेदिका कृषि:
    • सीढ़ीनुमा खेती।
    • तीव्र ढालों पर मृदा संरक्षण और कृषि। 🌾
  • अंतर-फसलीकरण (Intercropping):
    • एकांतर कतारों में विभिन्न फसलें।
    • मृदा गुणवत्ता बनी रहती है। 🌱
  • पट्टीदार कृषि:
    • फसलों के बीच घास की पट्टियाँ।
    • पवन अपरदन कम (शुष्क और तटीय क्षेत्र)। 🌾
  • रक्षक मेखलाएँ (Shelter Belts):
    • पेड़ों की कतारें।
    • पवन अपरदन रोकथाम। 🌳
  • अन्य उपाय:
    • वनीकरण और पुनर्वनीकरण
    • निर्वनीकरण और पशुचारण नियंत्रण
    • फसल चक्र कृषि
    • ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई। 💧
    • वालूका स्तूपों का स्थिरीकरण: झाड़ियाँ और घास।
    • अम्लीय मृदा उपचार: जिप्सम, लवण-प्रतिरोधी फसलें। 🌱

निष्कर्ष: मृदा का महत्व और संरक्षण 🌟

भारत में मृदा का वर्गीकरण देश की कृषि और पर्यावरण के लिए आधारभूत है। 🌍 जलोढ़, काली, लैटेराइट, और अन्य मृदाएँ भारत की विविध भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों का परिणाम हैं। मृदा अपरदन, लवणीयता, और मरुस्थलीकरण जैसी समस्याएँ कृषि उत्पादकता को प्रभावित करती हैं। 😓

मृदा संरक्षण के उपायों जैसे वनीकरण, सीढ़ीदार खेती, और शस्यावर्तन से इस अनमोल संसाधन को बचाया जा सकता है। 🌱 क्या आप भारत में मृदा का वर्गीकरण या इसके संरक्षण के बारे में और जानना चाहेंगे? अपनी राय कमेंट करें! 💬

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