1. राजस्थानी चित्रकला का अध्ययन और नामकरण
- आनंद कुमार स्वामी:
- राजस्थानी चित्रकला का सर्वप्रथम वैज्ञानिक अध्ययन किया।
- अपनी पुस्तक ‘राजपूत पेंटिंग्स’ (1916) में इसे ‘राजपूत चित्रकला’ नाम दिया।
- कर्नल जेम्स टॉड:
- ‘एनाल्स एंड एंटीक्वीटीज ऑफ राजस्थान’ में इसे ‘राजस्थानी चित्रकला’ कहा।
2. उद्भव और विकास
- राजस्थानी चित्रकला की उत्पत्ति 12वीं सदी में गुजरात की जैन शैली या अपभ्रंश शैली से मानी जाती है।
- सर्वप्रथम चित्रकला 12वीं सदी में गुजरात से राजस्थान के मेवाड़ राज्य में आई।
- राजस्थान में चित्रकला की पहली शैली मेवाड़ शैली मानी जाती है, जिस पर जैन शैली का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा।
- अन्य सभी शैलियों की उत्पत्ति मेवाड़ शैली से हुई।
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3. ऐतिहासिक कालखंड
- स्वतंत्र काल: 15वीं सदी।
- स्वर्णकाल: 17वीं और 18वीं सदी।
- राजस्थानी चित्रकला के जनक: महाराणा कुम्भा।
4. प्राचीनतम प्रमाण
- पुष्कर: मुनि अगस्त्य की गुफा में चित्र।
- दर (भरतपुर): मुकुन्दरा हिल्स के शैल चित्र।
- कोटा: आलनिया गाँव के चित्र।
- बैराठ / विजयनगर: भालेश्वर और अमरेश्वर (सवाई माधोपुर) के चित्र।
- तिब्बती इतिहासकार तारानाथ: मारवाड़ के चित्रकार श्रंग्धर का उल्लेख।
- 1060 ई. के जैसलमेर भण्डार में राजस्थान के सबसे प्राचीन चित्र उपलब्ध हैं:
- औध नियुक्ति वृत्ति।
- दस वैकालिका सूत्र चूर्णि।
- राय कृष्णदास: जैन शैली को अपभ्रंश शैली की उपमा दी।
- राजस्थानी चित्रकला का सबसे प्राचीन प्रमाण जैसलमेर भण्डार में मिलता है।
राजस्थान की चित्रकला का भौगोलिक एवं सांस्कृतिक आधार पर विभाजन (Division of Painting of Rajasthan on Geographical and Cultural Basis)-
- भौगोलिक एवं सांस्कृतिक आधार पर राजस्थान की चित्रकला को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है। जैसे-
- 1. मेवाड़ चित्रकला (Mewar Painting)- चांवड या उदयपुर, देवगढ़, नाथद्वारा
- 2. मारवाड़ चित्रकला (Marwar Painting)- जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, नागौर, अजमेर, जैसलमेर
- 3. ढूँढाड़ चित्रकला (Dhundhar Painting)- आमेर या जयपुर, अलवर, शेखावाटी (जयपुर रियासत का ठिकाना), उणियारा (जयपुर रियासत का ठिकाना)
- 4. हाड़ौती चित्रकला (Hadoti Painting)- बूंदी, कोटा
| चित्रकला शैली | उपशैली |
| मेवाड़ चित्रकला | (1) चावंड चित्रकला (2) देवगढ़ चित्रकला (3) नाथद्वारा चित्रकला (4) उदयपुर चित्रकला |
| मारवाड़ चित्रकला | (1) जोधपुर चित्रकला (2) बीकानेर चित्रकला (3) किशनगढ़ चित्रकला (4) नागौर चित्रकला (5) अजमेर चित्रकला (6) जैसलमेर चित्रकला |
| ढूंढाड़ चित्रकला | (1) आमेर चित्रकला या जयपुर चित्रकला (2) अलवर चित्रकला (3) शेखावाटी चित्रकला (4) उणियारा चित्रकला |
| हाड़ौती चित्रकला | (1) बूंदी चित्रकला (2) कोटा चित्रकला |
मेवाड़ स्कूल ऑफ पेंटिंग्स
1. उदयपुर शैली (मेवाड़ शैली)
- यह राजस्थानी चित्रकला की प्रथम शैली है, जिसकी उत्पत्ति 12वीं सदी में अपभ्रंश शैली से हुई।
- राजस्थान की सबसे प्राचीन शैली मानी जाती है।
- इस शैली पर जैन धर्म और जैन शैली का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा।
- प्रारंभिक ग्रंथ जैन धर्म से संबंधित थे।
स्वर्णकाल:
- महाराणा जगसिंह का काल
- चित्रकारों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया।
- चित्रकला का स्वतंत्र विभाग स्थापित किया गया।
- चितेरों की “आवेरी” और “तस्वीरों रो कारखानो” बनाए गए।
विशेषताएँ:
- कद छोटा, रंग गौरा, लाल और पीले रंगों की प्रधानता।
- कदंब वृक्ष, पहाड़ी दृश्य, और प्राकृतिक चित्रण।
- गीत-गोविंद, रागमाला, बारहमासा, ससिक प्रिया के टीके का प्रमुख चित्रण।
- नरोत्तम शर्मा द्वारा निर्मित “मुरली मनोहर” को मेवाड़ शैली का मोनालिसा माना जाता है।
- जैनाचार्य हीरानंद द्वारा 1423 ई. में “सुपार्श्वनाथ चरियम” चित्रित किया गया, जो उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।
- जैनाचार्य हीरानंद, महाराणा कुम्भा के चित्रकला गुरु थे।
2. नाथद्वारा शैली (हवेली शैली)
- इस शैली की शुरुआत 1671-72 ई. में नाथद्वारा में श्रीनाथजी के मंदिर की स्थापना के साथ हुई।
- नाथद्वारा शैली मेवाड़ और ब्रज शैली का मिश्रण है।
स्वर्णकाल:
- महाराणा राजसिंह का काल
विशेषताएँ:
- पिछवाईयों का चित्रण
- सांझी का चित्रण
- माता यशोदा और कृष्ण लीलाओं का चित्रण
- गाय और हिरण के समान नेत्र
- केले के वृक्ष की प्रधानता
- प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण
- पुजारियों और गुसाईयों का चित्रण
3. चावंड शैली
- 1585 ई. में महाराणा प्रताप ने चावंड को अपनी राजधानी बनाया।
- यह शैली महाराणा प्रताप द्वारा आरंभ की गई।
स्वर्णकाल:
- महाराणा अमरसिंह का काल
महत्त्वपूर्ण योगदान:
- 1605 ई. में चित्रकार नसरूद्दीन द्वारा “रागमाला” नामक ग्रंथ चित्रित किया गया, जो मेवाड़ स्कूल ऑफ पेंटिंग्स का सबसे बड़ा ग्रंथ है।
4. देवगढ़ शैली
- देवगढ़, मेवाड़ राज्य का एक प्रमुख ठिकाना था, जो वर्तमान में राजसमंद जिले में स्थित है।
- इस शैली की शुरुआत द्वारकाधीश चुंडावत ने की।
महत्त्वपूर्ण योगदान:
- द्वारकाधीश चुंडावत ने मोती महल में भित्ति चित्र बनवाए।
- इस शैली को पहचान देने का श्रेय डॉ. धीर अंधारे को जाता है।
प्रमुख चित्रकार:
- केवला, बगता, बैजनाथ, चौखा
प्रमुख चित्रकारों के नाम
उदयपुर शैली
- कमलचंद, मनोहर, साहिबुद्दीन, जैनाचार्य, हीराचंद
नाथद्वारा शैली
- चतर्भुज, रामलिंग, देवकृष्ण, रामचंद्र, भगवान, कमला, इलाइची (महिला चित्रकार), हरिदेव, घासीराम, उदयराम, नसीरुद्दीन
चावंड शैली
- नसरूद्दीन
देवगढ़ शैली
- केवला, बगता, बैजनाथ, चौखा
मारवाड़ स्कूल ऑफ पेंटिंग्स
1. मारवाड़ शैली (जोधपुर शैली)
आरंभ:
राव मालदेव के काल में शुरू हुई।
मेहरानगढ़ दुर्ग में चोखेलाव महल का निर्माण करवाया गया।
प्रारंभिक चित्र:
राम-रावण युद्ध
सप्तसती
प्रथम ग्रंथ: ‘उत्तरध्यायन सूत्र चूर्णि’ (राव मालदेव द्वारा चित्रित)।
स्वर्णकाल:
महाराजा जसवंतसिंह: कृष्ण लीलाओं का चित्रण।
महाराजा मानसिंह:
नाथों के मठों में शैली का विकास।
महामंदिर व उदयमंदिर में वीरजीदास भाटी द्वारा ‘रागमाला’ और मतीराम द्वारा ‘राजरस सार’ ग्रंथ चित्रित।
विशेषताएँ:
मरूस्थल, घोड़े, झाड़ियाँ।
पीले रंग की प्रधानता।
बादाम जैसे नेत्र।
आम के वृक्ष का चित्रण।
2. अजमेर शैली
विशेषताएँ:
बैंगनी रंग की प्रधानता।
मसूदा, कैकड़ी और भिनाय ठिकानों में भित्ति चित्र।
3. नागौर शैली
विशेषताएँ:
कलात्मक बादल महल पर भित्ति चित्र।
बुझे हुए रंगों का प्रयोग।
4. जैसलमेर शैली (मांड शैली)
विशेषताएँ:
मरूस्थल, झाड़ियाँ, और ऊँटों का चित्रण।
भित्ति चित्र: नथमल की हवेली, पटवों की हवेली और सालिम सिंह मेहता की हवेली।
मुख्य विषय: मूमल का चित्रण।
5. किशनगढ़ शैली
आरंभ व स्वर्णकाल:
महाराजा सांवतसिंह (नागरीदास) का काल।
विशेषताएँ:
कजरारे नयन।
सुराहीदार गर्दन।
नाक में बेसरी आभूषण।
लम्बे बाल।
पारदर्शी वस्त्र।
गुलाबी रंग की प्रधानता।
प्रमुख चित्र: उड़ते भंवरे, तैरती नौकाएँ, बातें करती सहेलियाँ।
6. बीकानेर शैली
आरंभ:
महाराजा रायसिंह द्वारा।
‘भागवत पुराण’ पहला चित्रित ग्रंथ।
स्वर्णकाल:
महाराजा अनुपसिंह के काल में।
द्रविड़ शैली का प्रभाव।
विशेषताएँ:
पीले रंग की प्रधानता।
घोड़ों का सर्वाधिक चित्रण।
शुरुआत से ही मुगल शैली का प्रभाव।
उस्ता कला:
भित्ति चित्रण।
काष्ठ पर नक्काशी।
ऊँट के बाल, खाल और कूबड़ पर सोने की नक्काशी।
मथैरण कला:
जैन समाज के कलाकारों द्वारा विकसित।
देवताओं और जैन ग्रंथों का चित्रण।
7. शेखावाटी शैली
विकास:
स्थानीय साहुकारों, सेठों और जागीरदारों द्वारा।
भित्ति चित्रण के लिए प्रसिद्ध।
विशेषताएँ:
सामान्य जनजीवन का चित्रण।
हवेलियों पर बलकाते बालों का चित्रण।
भित्ति चित्र: शेखावाटी के विभिन्न स्थलों पर उपलब्ध।
ढूँढाड़ स्कूल ऑफ पेंटिंग्स
1. आमेर शैली
प्रारंभकर्ता:
मिर्जा राजा मानसिंह।
चित्रकार:
पुष्पदत्त, हुक्काचंद, मुरली।
प्रमुख कार्य:
पुष्पदत्त ने ‘आदि पुराण’ ग्रंथ का चित्रण किया।
मुरली ने ‘बिहारी सतसई’ ग्रंथ का चित्रण किया।
स्वर्णकाल:
मिर्जा राजा जयसिंह का काल।
इस काल में सर्वाधिक चित्र चित्रित हुए।
विशेषताएँ:
आरंभ से ही मुगल शैली का प्रभाव।
प्राकृतिक रंगों का प्रयोग (जैसे देग गेरू, हरी मिर्च)।
2. उणियारा शैली
स्थान:
जयपुर राज्य का एक ठिकाना, जो वर्तमान में टोंक जिले में है।
चित्रकार:
धीमा, मीरबक्श, उगमा।
विशेषता:
यह शैली जयपुर शैली और बूंदी शैली का मिश्रण है।
3. अलवर शैली
प्रारंभ:
अलवर राज्य की स्थापना 1775 में राव प्रतापसिंह द्वारा की गई।
राजधानी: राजगढ़ दुर्ग।
चित्रकार:
डालूराम, नानकराम, नंदलाल, मूलचंद सोनी, छोटेलाल, जमनालाल।
स्वर्णकाल:
महाराजा विनयसिंह का काल।
इस काल में सर्वाधिक चित्र चित्रित हुए।
प्रमुख कार्य:
भित्ति चित्रण: डालूराम।
जेवरातों की स्याही से ‘गुलिस्तां’ ग्रंथ चित्रित (दिल्ली के चित्रकारों द्वारा)।
विशेषताएँ:
हाथी दांत पर व्यक्ति का चित्रण (मूलचंद सोनी)।
बार्डर को महत्व दिया गया (जिसे बैसलो शैली कहते हैं)।
योगासन, गणिकाओं और वैश्याओं के चित्र।
मुगल शैली का प्रभाव (दिल्ली के निकट होने के कारण)।
4. जयपुर शैली
प्रारंभकर्ता:
सवाई जयसिंह।
दरबारी कवि:
मोहम्मद शाह।
उन्होंने ‘रज्जनामा’ ग्रंथ चित्रित करके सवाई जयसिंह को भेंट किया।
स्वर्णकाल:
सवाई प्रतापसिंह का काल।
इनके दरबार में 22 चित्रकार, 22 कवि, 22 संगीतकार और 22 विद्वानों की मंडली थी (जिसे गंधर्व बाइसी कहा जाता था)।
प्रतापसिंह ने “सूरतखाना” नामक चित्रकला विभाग की स्थापना हवामहल में की।
चित्रकारों को राजकीय संरक्षण दिया।
आधुनिक योगदान:
सवाई रामसिंह के काल में कम्पनी शैली का प्रभाव पड़ा।
मदरसा-हुनरी / राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट की स्थापना की गई।
विशेषताएँ:
व्यक्ति का चित्रण (सबीह शैली)।
कुरान पद्धति और शहजादियों का चित्रण।
आरंभ से ही मुगल शैली का प्रभाव।
हाड़ौती स्कूल ऑफ पेंटिंग्स
1. कोटा शैली
चित्रकार:
डालू, लच्छीराम, रामजीराम, गोविंद, रघुनाथ।
विशेषताएँ:
इसे “शिकार शैली” कहा जाता है।
प्रमुख विषय शिकार के दृश्य।
इस शैली में सर्वाधिक चित्र शिकार पर आधारित हैं।
राजाओं के साथ-साथ रानियों को भी शिकार करते हुए दर्शाया गया है।
प्रमुख योगदान:
डालू:
‘रागमाला’ नामक ग्रंथ का चित्रण।
ग्रंथ के अधिकांश चित्र शिकार पर आधारित हैं।
झालाओं की हवेली:
इस शैली के सर्वाधिक भित्ति चित्र शिकार पर आधारित हैं।
2. बूंदी शैली
चित्रकार:
सुर्जन, श्रीकृष्ण, नूर मोहम्मद।
विशेषताएँ:
पशुओं और पक्षियों का प्रमुखता से चित्रण।
हरे रंग की प्रधानता।
सोने और चांदी के रंगों का सुंदर उपयोग।
रेखाओं का सुन्दरतम अंकन।
नाचते हुए मोर का चित्रण (केवल बूंदी शैली में)।
उपशैली:
दुगदी शैली।
प्रमुख योगदान:
तारागढ़ दुर्ग (बूंदी) के चित्रण: बर सिंह हाड़ा।
रणशाला/चित्रशाला महल का निर्माण: उम्मेद सिंह।
भित्ति चित्रों का स्वर्ग माने जाने वाले चित्र।
विशेष अध्ययन:
कार्ल खण्डेलवाल:
बूंदी शैली पर शोध किया और ‘बूंदी ग्रंथावली’ नामक ग्रंथ लिखा।
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| चित्रशैली | स्वर्णकाल | चित्रकार का नाम |
| मेवाड़/उदयपुर | जगतसिंह I | साहबद्दीन, मनोहर, कृपाराम, जीवाराम, नसीरुद्दीन |
| जोधपुर | जसवंत/मालदेव | रामा, नाथा, छज्जू, सेफू, अमरदास माधोदास, रामसिंह, दाना भाटी, शंकर, शिवदास |
| नाथद्वारा | राजसिंह | कमला, इलाचयी, चम्पालाल, घासीराम, तुलसीराम, चतुर्भुज, नारायण, रामचन्द्र |
| अलवर | विनयसिंह | जमुनादास, बक्साराम, सालिगराम, नंदराम, मूलचंद, उदयराम, छोटेलाल |
| किशनगढ़ | सावंतसिंह | मोरध्वज निहालचंद, सीताराम, नानकराम, लाडलीदास, सवाईराम, बदनसिंह, मूलराज |
| बूंदी | उम्मेदसिंह | लच्छीराम, अहमद अली, रामलाल, श्रीकिशन |
| देवगढ़ | श्रीघर अंधारे | बगता, कँवला, चोखा, बेजनाथ, हरचंद |
| बीकानेर | अनूपसिंह | हमीद, अलीरजा, रामलाल, अहमद, हसन |
| अजमेर | – | अल्लाबक्श, उस्ना, साहिबा (महिला), चांद, सांवर, नांद, जूनिया, खरवा, मसुदा, माधोजी, रामसिंह भाटी |
| कोटा | उम्मेदसिंह | रघुनाथ, गोविंदराम, डालू, लच्छीराम, नूर मोहम्मद |
| आमेर | जयसिंह | गोपाल, उदय, हुक्मा, त्रिलोक, हीरानंद, रामजीदास |
| जयपुर | प्रतापसिंह | साहिबराम, लालचंद, निरंजन, चतुर्भुज |
| चावंड | अमरसिंह I | नसीरुद्दीन |
| उनियारा | – | मीरबक्श, काशीराम, धीमा, बक्ता, कवलाँ, रामलखन, भीम |





